कृषि भूमि का हो रहा दुरूपोेग..
Jan 13, 2023
कृषि भूमियों पर अवैध तरीके से मैरिज हॉल व होटलों का हो रहा निर्माण
अधिकारियों की मिलीभगत से बिल्डरों व भू-माफियाओं के बल्ले-बल्ले
मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान हैं रहवासी
भोपाल : हमारे देश को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, क्योंकि यहां सर्वाधिक मात्रा में लोग कृषि पर निर्भर हैं और कृषि के माध्यम से ही अपना गुजर-बसर करते आए हैं, लेकिन ऐसे में अब बड़े-बड़े बिल्डरों की नजरें शहर क्षेत्र से हटकर ग्रामीण क्षेत्रों में भटकती नजर आ रही हैं। ऐसे में सम्बंधित कुछ नेताओं की मिलीभगत से अधिकारियों की नांक के नीचे कृषि भूमियों का जमकर दोहन किया जा रहा है।
यह वाक्या राजधानी के नीलबड़ क्षेत्र का है, जिसके आसपास कई ग्रामीण क्षेत्र हैं, जहां खेती योग्य कृषि भूमि अधिक संख्या में है। जो कि ग्राम पंचायत में आता था, जिस कारण वहां पर भू-माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर कृषि भूमियों पर अवैध कब्जा व अनियमितताओं का जाल फैला हुआ था, जिसको देखते हुए नीलबड़ को 2014 में नगर निगम की सीमा के अधिग्रहीत कर दिया गया था, जिससे वहां विकास हो सके और अवैध भू-माफियाओं व भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जा सके, लेकिन यह सिलसिला अभी भी जारी है। कुछ नेता व अधिकारियों की मिलीभगत से कृषि भूमियों पर गलत तरीके से होटलों, मैरिज हॉलों का संचालन किया जा रहा है।
नीलबड़ क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं के लिए रहवासियों को रोजाना परेशान होना पड़ता है, रोजना उनके सामने कभी पानी, साफ-सफाई व अन्य व्यवस्थाओं का संकट सामने खड़ा नजर आता है, कई बार शिकायतें करने के बावजूद भी समस्याओं का हल नहीं निकाला गया, यहां तक कि उनसे बात करना भी लाजमी नहीं समझा गया, जिससे वह सम्बंधितों से बात करने में भी कतराते हैं।
कृषि भूमियों पर खड़े हो रहे कंक्रीट के जंगल
नीलबड़ को नगर निगम के अधिग्रहण इसलिए किया गया था, जिससे कि वहां फैले भू-माफियाओं व भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसी जा सके, जो कि कुछ हद तक सफल हुआ, लेकिन अवैध कब्जाधारी बिल्डरों ने नेताओं व अधिकारियों की मिलीभगत से इससे बचने के नए-नए तरीकों का दामन थाम लिया है, अब वह कृषि भूमियों को कम दामों में खरीदकर वहां मैरिज हॉल व होटलों का निर्माण कर रहे हैं, जिससे कृषि भूमि कब्र में दफन सी होती नजर जा रही हैं, और उन पर कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं।
टुकड़ों में बिक रहीं कृषि भूमि
नीलबड़ क्षेत्र में बिल्डरों द्वारा किसानों को बहला कर उनसे उनकी कृषि भूमि कम दामों में क्रय कर ली जाती है, जिसके बाद वह बिना सरकार की अनुमति के छोटे-छोटे टुकड़ों में कृषि भूमि लोगों को बेच देते हैं, लेकिन जिनके द्वारा यह जमीन के टुकड़े खरीदे जाते हैं, जब वह इन पर निर्माण करते हैं तो उन्हें सरकारी दस्तावेजों में उलझना पड़ जाता है, जिससे वह अपने आप को कटघड़े में खड़ा महसूस करते हैं। और यदि निर्माण हो भी जाता है तो कई सुखः सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। और यह सब कुछ नेताओं व अधिकारियों की नांक के नीचे हो रहा है, लेकिन सरकार को इसकी भनक तक नहीं है।
लाखों का टैक्स चोरी
यदि कोई कृषि भूमि नगर निगम के दायरे में आती है और यदि कोई अन्य व्यक्ति अपने निजी उद्योग या किसी औद्योगिक उददेश्य से क्रय करता है तो उसे सम्बंधित दस्तावेजों सहित टैक्स की पूर्ति करनी होती है, जिसकी कीमत लाखों रूपए तक होती है। परन्तु नीलबड़ क्षेत्र में कुछ बिल्डरों, नेताओं द्वारा अधिकारियों की सांठगांठ से लाखों रूपए के टैक्स का गमन किया जा रहा है, परन्तु सम्बंधित अधिकारी, कर्मचारी मौन साधे हुए हैं।
क्या है कानून...?
कृषि भूमि पार्सल पर आपकी पूर्ण स्वामित्व के बावजूद आप इस भूमि का उपयोग निवासों के निर्माण या अन्य किसी निर्माण के लिए नहीं कर सकते हैं, जब तक कि सरकार आपको ऐसा करने की अनुमति न दे। कानून के प्रावधानों के तहत, उपजाऊ कृषि भूमि का उपयोग कृषि उद्देश्यों के लिए ही किया जा सकता है। लेकिन किसान स्वयं अपनी कृषि भूमि को भूमि अधिनियम की धारा 143 के तहत अकृषि भूमि के रूप में परिवर्तित कराकर अपनी मर्जी से अपनी कृषि भूमि का उपयोग कर सकता है, परन्तु कोई अन्य व्यक्ति जो भूमि से सम्बंधित नहीं है वह किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं कर सकता है।
नीलबड़ क्षेत्र में पिछले 6-7 सालों में कृषि भूमियों का जमकर दोहन किया गया है, जिस कारण वहां कृषि भूमि का अभाव नजर आने लगा है, जो कि सरकार की मंशा के विपरीत उन्हीं के अधिकारियों की मिलीभगत से हो रहा हैं। क्या इन पर नकेल कसना मुश्किल है...?
इनका कहना...
ऐसा कुछ नहीं है निजी जमीन पर ही निर्माण कार्य हो रहा है, शासकीय व डूब क्षेत्र की जमीनों पर किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं हो रहा है, यदि कहीं कृषि भूमि पर निर्माण कार्य हो रहे हैं तो वह परमिशन के आधार पर हो रहे हैं। यदि कहीं कुछ गलत हो रहा है तो उसे देखा जाएगा व कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
आकाश श्रीवास्तव
एसडीएम हुजूर, भोपाल।