मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।
18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।
कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’
मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’
उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।
उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया।
उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।
मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है।
उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।
मुंबई। बॉलीवुड के मशहूर निर्देशक संजय लीला भंसाली अपनी आगामी फिल्म लव एंड वॉर की शूटिंग पूरी करने के करीब हैं और इसके तुरंत बाद वह अपने अगले बड़े प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने वाले हैं। इस बीच सिनेमा प्रेमियों के लिए एक बेहद रोमांचक खबर सामने आई है कि संजय लीला भंसाली हिंदी सिनेमा की बेमिसाल अदाकारा मधुबाला की बायोपिक का निर्माण करने की तैयारी में हैं।
इस बहुप्रतीक्षित बायोपिक में धुरंधर फेम अभिनेत्री सारा अर्जुन, मधुबाला के प्रतिष्ठित किरदार में नजर आ सकती हैं। यह सारा अर्जुन के करियर के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है, क्योंकि मधुबाला का किरदार निभाना किसी भी अभिनेत्री के लिए एक चुनौतीपूर्ण और सम्मानजनक अवसर होगा।
हालांकि अभी इस फिल्म का शीर्षक तय नहीं हुआ है, लेकिन डार्लिंग्स जैसी सफल फिल्म का निर्देशन कर चुकीं जसमीत के. रीन इस बायोपिक की कमान संभालेंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म की शूटिंग इसी साल सितंबर से शुरू होने की उम्मीद है, और सारा अर्जुन ने मधुबाला के किरदार में पूरी तरह ढलने के लिए अपनी तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। सूत्रों के अनुसार, मुंबई के गोरेगांव स्थित रॉयल पाम्स में जैसे ही संजय लीला भंसाली की लव एंड वॉर की शूटिंग खत्म होगी, वहीं पर इस बायोपिक का भव्य सेट तैयार किया जाएगा।
प्रोडक्शन डिजाइन टीम अगस्त के आखिर तक इस लोकेशन को 1950 के दशक के परिवेश में ढालने का काम शुरू कर देगी, ताकि सितंबर में शूटिंग फ्लोर पर जा सके। मेकर्स का पूरा ध्यान मधुबाला की अद्वितीय शख्सियत, उनके हाव-भाव और उस दौर के तौर-तरीकों को पर्दे पर जीवंत रूप से उतारने पर है, जिससे दर्शक उनके जीवन की गहराई और खूबसूरती को महसूस कर सकें।

भारतीय सिनेमा में मधुबाला का नाम आज भी एक मिसाल है। महज 36 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली इस महान अभिनेत्री ने महल, मिस्टर एंड मिसेज 55, चलती का नाम गाड़ी और बरसात की रात जैसी कई सदाबहार फिल्मों में अपनी अद्भुत अदाकारी का जादू बिखेरा। वहीं, के. आसिफ की कालजयी फिल्म मुगल-ए-आजम में उन्होंने अपनी दमदार अदाकारी से अनारकली के किरदार को अमर कर दिया, जिसे आज भी याद किया जाता है।
इस बायोपिक की बाकी स्टारकास्ट और स्क्रीनप्ले को लेकर फिलहाल ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन इस प्रोजेक्ट को लेकर अभी से ही फैंस के बीच जबरदस्त उत्सुकता और चर्चा का माहौल बन गया है।
बायोपिक का काम शुरू करने से पहले, संजय लीला भंसाली अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म लव एंड वॉर को अंतिम रूप दे रहे हैं। इस फिल्म में बॉलीवुड के तीन बड़े सितारे रणबीर कपूर, आलिया भट्ट और विक्की कौशल मुख्य किरदारों में नजर आएंगे। फिलहाल मुंबई के रॉयल पाम्स में फिल्म के आखिरी गाने की शूटिंग चल रही है, जो अगस्त के अंत तक खत्म होने की उम्मीद है। संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित यह भव्य फिल्म 21 जनवरी 2027 को सिनेमाघरों में दस्तक देगी।
- बीएसई और एनएसई के आधिकारिक कैलेंडर में शामिल नहीं हैं ये त्योहार
मुंबई। भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर है। ईद-ए-मिलाद और रक्षाबंधन के मौके पर बाजार बंद रहने को लेकर चल रहा असमंजस अब समाप्त हो गया है। 26 अगस्त को ईद-ए-मिलाद और 28 अगस्त को रक्षाबंधन के अवसर पर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में सामान्य कारोबार जारी रहेगा। ये दोनों दिन शेयर बाजार के आधिकारिक ट्रेडिंग हॉलिडे कैलेंडर का हिस्सा नहीं हैं। सिर्फ इक्विटी बाजार ही नहीं, मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर भी ट्रेडिंग जारी रहेगी।
इसके साथ ही, 2026 में शेयर बाजार के लिए कुछ अन्य अवकाश भी निर्धारित हैं:
14 सितंबर (सोमवार): गणेश चतुर्थी
2 अक्टूबर (शुक्रवार): महात्मा गांधी जयंती
20 अक्टूबर (मंगलवार): दशहरा
10 नवंबर (मंगलवार): दिवाली-बलिप्रतिपदा
24 नवंबर (मंगलवार): प्रकाश गुरुपुरब श्री गुरु नानक देव
25 दिसंबर (शुक्रवार): क्रिसमस
खास बात यह है कि 8 नवंबर को रविवार होने के बावजूद दिवाली लक्ष्मी पूजन के अवसर पर विशेष मुहूर्त ट्रेडिंग सत्र का आयोजन किया जाएगा। बीएसई और एनएसई इस सत्र के समय की घोषणा दिवाली से पहले करेंगे।
बेंगलुरु। 15 साल के आक्रामक बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी दिलीप ट्रॉफी में ईस्ट जोन की उपकप्तानी करते हुए रन बनाने में तो असफल रहे पर गेंदबाजी करते हुए एक ही ओवर में दो-दो विकेट लेकर उन्होंने अपनी क्षमताएं दिखायी हैं। वैभव ने शानदार स्पिन गेंदबाजी करते हुए नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ एक ही ओवर में दो-दो विकेट ले लिये।
बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) में पूर्वी क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बीच चल रहे इस रोमांचक मुकाबले में वैभव का जादू 28वें ओवर में चला। इस ओवर की दूसरी गेंद पर वैभव ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बल्लेबाज लिंगदोह को एक बड़ा शॉट खेलने के प्रयास में सर्कल के भीतर ही कैच आउट करवाया।
अभी विपक्षी टीम इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि वैभव ने इसी ओवर की पांचवीं गेंद पर, नए बल्लेबाज लेमतूर को विकेटकीपर ईशान किशन के हाथों कैच आउट करवाकर पवेलियन का रास्ता दिखा दिया। एक ही ओवर में दो महत्वपूर्ण विकेट हासिल करने के बाद वैभव सूर्यवंशी का उत्साह देखने लायक था। उनका यह प्रदर्शन न केवल विरोधी टीम पर दबाव बनाने वाला था, बल्कि उनकी टीम के लिए भी प्रेरणादायक साबित हुआ।
दलीप ट्रॉफी, जो भारत के घरेलू क्रिकेट में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, युवा प्रतिभाओं को अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने का एक शानदार मंच प्रदान करती है। वैभव ने पूर्वी क्षेत्र के उपकप्तान के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता का भी परिचय दिया।
टीम के कप्तान और अनुभवी विकेटकीपर ईशान किशन ने वैभव की गेंदों पर चुस्त विकेटकीपिंग का प्रदर्शन करते हुए लेमतूर का कैच लपका, जो टीम वर्क का एक बेहतरीन उदाहरण था। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक युवा खिलाड़ी, अनुभवी खिलाड़ियों के साथ मिलकर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
हालांकि, वैभव सूर्यवंशी का दिन बल्लेबाजी के लिहाज से उतना सफल नहीं रहा था। अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी और बड़े छक्कों के लिए मशहूर यह युवा खिलाड़ी, इस मुकाबले में सिर्फ छह गेंदों का सामना कर आठ रन ही बना सका और पवेलियन लौट गया।
उन्होंने अपने इन आठ रनों में दो शानदार चौके जरूर लगाए थे, लेकिन उनकी बल्लेबाजी पारी उम्मीदों के मुताबिक नहीं थी। यह एक अजीबोगरीब स्थिति थी जहां एक ओर उनका बल्ला शांत रहा, वहीं दूसरी ओर उनकी गेंद ने कहर बरपाया। यह विरोधाभास उनके प्रदर्शन को और भी यादगार बना देता है।
बेंगलुरु। 15 साल के आक्रामक बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी दिलीप ट्रॉफी में ईस्ट जोन की उपकप्तानी करते हुए रन बनाने में तो असफल रहे पर गेंदबाजी करते हुए एक ही ओवर में दो-दो विकेट लेकर उन्होंने अपनी क्षमताएं दिखायी हैं। वैभव ने शानदार स्पिन गेंदबाजी करते हुए नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ एक ही ओवर में दो-दो विकेट ले लिये।
बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) में पूर्वी क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बीच चल रहे इस रोमांचक मुकाबले में वैभव का जादू 28वें ओवर में चला। इस ओवर की दूसरी गेंद पर वैभव ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बल्लेबाज लिंगदोह को एक बड़ा शॉट खेलने के प्रयास में सर्कल के भीतर ही कैच आउट करवाया।
अभी विपक्षी टीम इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि वैभव ने इसी ओवर की पांचवीं गेंद पर, नए बल्लेबाज लेमतूर को विकेटकीपर ईशान किशन के हाथों कैच आउट करवाकर पवेलियन का रास्ता दिखा दिया। एक ही ओवर में दो महत्वपूर्ण विकेट हासिल करने के बाद वैभव सूर्यवंशी का उत्साह देखने लायक था। उनका यह प्रदर्शन न केवल विरोधी टीम पर दबाव बनाने वाला था, बल्कि उनकी टीम के लिए भी प्रेरणादायक साबित हुआ।
दलीप ट्रॉफी, जो भारत के घरेलू क्रिकेट में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, युवा प्रतिभाओं को अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने का एक शानदार मंच प्रदान करती है। वैभव ने पूर्वी क्षेत्र के उपकप्तान के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता का भी परिचय दिया।
टीम के कप्तान और अनुभवी विकेटकीपर ईशान किशन ने वैभव की गेंदों पर चुस्त विकेटकीपिंग का प्रदर्शन करते हुए लेमतूर का कैच लपका, जो टीम वर्क का एक बेहतरीन उदाहरण था। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक युवा खिलाड़ी, अनुभवी खिलाड़ियों के साथ मिलकर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
हालांकि, वैभव सूर्यवंशी का दिन बल्लेबाजी के लिहाज से उतना सफल नहीं रहा था। अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी और बड़े छक्कों के लिए मशहूर यह युवा खिलाड़ी, इस मुकाबले में सिर्फ छह गेंदों का सामना कर आठ रन ही बना सका और पवेलियन लौट गया।
उन्होंने अपने इन आठ रनों में दो शानदार चौके जरूर लगाए थे, लेकिन उनकी बल्लेबाजी पारी उम्मीदों के मुताबिक नहीं थी। यह एक अजीबोगरीब स्थिति थी जहां एक ओर उनका बल्ला शांत रहा, वहीं दूसरी ओर उनकी गेंद ने कहर बरपाया। यह विरोधाभास उनके प्रदर्शन को और भी यादगार बना देता है।
बेंगलुरु। 15 साल के आक्रामक बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी दिलीप ट्रॉफी में ईस्ट जोन की उपकप्तानी करते हुए रन बनाने में तो असफल रहे पर गेंदबाजी करते हुए एक ही ओवर में दो-दो विकेट लेकर उन्होंने अपनी क्षमताएं दिखायी हैं। वैभव ने शानदार स्पिन गेंदबाजी करते हुए नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ एक ही ओवर में दो-दो विकेट ले लिये।
बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) में पूर्वी क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बीच चल रहे इस रोमांचक मुकाबले में वैभव का जादू 28वें ओवर में चला। इस ओवर की दूसरी गेंद पर वैभव ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बल्लेबाज लिंगदोह को एक बड़ा शॉट खेलने के प्रयास में सर्कल के भीतर ही कैच आउट करवाया।
अभी विपक्षी टीम इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि वैभव ने इसी ओवर की पांचवीं गेंद पर, नए बल्लेबाज लेमतूर को विकेटकीपर ईशान किशन के हाथों कैच आउट करवाकर पवेलियन का रास्ता दिखा दिया। एक ही ओवर में दो महत्वपूर्ण विकेट हासिल करने के बाद वैभव सूर्यवंशी का उत्साह देखने लायक था। उनका यह प्रदर्शन न केवल विरोधी टीम पर दबाव बनाने वाला था, बल्कि उनकी टीम के लिए भी प्रेरणादायक साबित हुआ।
दलीप ट्रॉफी, जो भारत के घरेलू क्रिकेट में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, युवा प्रतिभाओं को अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने का एक शानदार मंच प्रदान करती है। वैभव ने पूर्वी क्षेत्र के उपकप्तान के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता का भी परिचय दिया।
टीम के कप्तान और अनुभवी विकेटकीपर ईशान किशन ने वैभव की गेंदों पर चुस्त विकेटकीपिंग का प्रदर्शन करते हुए लेमतूर का कैच लपका, जो टीम वर्क का एक बेहतरीन उदाहरण था। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक युवा खिलाड़ी, अनुभवी खिलाड़ियों के साथ मिलकर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
हालांकि, वैभव सूर्यवंशी का दिन बल्लेबाजी के लिहाज से उतना सफल नहीं रहा था। अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी और बड़े छक्कों के लिए मशहूर यह युवा खिलाड़ी, इस मुकाबले में सिर्फ छह गेंदों का सामना कर आठ रन ही बना सका और पवेलियन लौट गया।
उन्होंने अपने इन आठ रनों में दो शानदार चौके जरूर लगाए थे, लेकिन उनकी बल्लेबाजी पारी उम्मीदों के मुताबिक नहीं थी। यह एक अजीबोगरीब स्थिति थी जहां एक ओर उनका बल्ला शांत रहा, वहीं दूसरी ओर उनकी गेंद ने कहर बरपाया। यह विरोधाभास उनके प्रदर्शन को और भी यादगार बना देता है।
बेंगलुरु। 15 साल के आक्रामक बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी दिलीप ट्रॉफी में ईस्ट जोन की उपकप्तानी करते हुए रन बनाने में तो असफल रहे पर गेंदबाजी करते हुए एक ही ओवर में दो-दो विकेट लेकर उन्होंने अपनी क्षमताएं दिखायी हैं। वैभव ने शानदार स्पिन गेंदबाजी करते हुए नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ एक ही ओवर में दो-दो विकेट ले लिये।
बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) में पूर्वी क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बीच चल रहे इस रोमांचक मुकाबले में वैभव का जादू 28वें ओवर में चला। इस ओवर की दूसरी गेंद पर वैभव ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बल्लेबाज लिंगदोह को एक बड़ा शॉट खेलने के प्रयास में सर्कल के भीतर ही कैच आउट करवाया।
अभी विपक्षी टीम इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि वैभव ने इसी ओवर की पांचवीं गेंद पर, नए बल्लेबाज लेमतूर को विकेटकीपर ईशान किशन के हाथों कैच आउट करवाकर पवेलियन का रास्ता दिखा दिया। एक ही ओवर में दो महत्वपूर्ण विकेट हासिल करने के बाद वैभव सूर्यवंशी का उत्साह देखने लायक था। उनका यह प्रदर्शन न केवल विरोधी टीम पर दबाव बनाने वाला था, बल्कि उनकी टीम के लिए भी प्रेरणादायक साबित हुआ।
दलीप ट्रॉफी, जो भारत के घरेलू क्रिकेट में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, युवा प्रतिभाओं को अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने का एक शानदार मंच प्रदान करती है। वैभव ने पूर्वी क्षेत्र के उपकप्तान के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता का भी परिचय दिया।
टीम के कप्तान और अनुभवी विकेटकीपर ईशान किशन ने वैभव की गेंदों पर चुस्त विकेटकीपिंग का प्रदर्शन करते हुए लेमतूर का कैच लपका, जो टीम वर्क का एक बेहतरीन उदाहरण था। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक युवा खिलाड़ी, अनुभवी खिलाड़ियों के साथ मिलकर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
हालांकि, वैभव सूर्यवंशी का दिन बल्लेबाजी के लिहाज से उतना सफल नहीं रहा था। अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी और बड़े छक्कों के लिए मशहूर यह युवा खिलाड़ी, इस मुकाबले में सिर्फ छह गेंदों का सामना कर आठ रन ही बना सका और पवेलियन लौट गया।
उन्होंने अपने इन आठ रनों में दो शानदार चौके जरूर लगाए थे, लेकिन उनकी बल्लेबाजी पारी उम्मीदों के मुताबिक नहीं थी। यह एक अजीबोगरीब स्थिति थी जहां एक ओर उनका बल्ला शांत रहा, वहीं दूसरी ओर उनकी गेंद ने कहर बरपाया। यह विरोधाभास उनके प्रदर्शन को और भी यादगार बना देता है।
बेंगलुरु। 15 साल के आक्रामक बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी दिलीप ट्रॉफी में ईस्ट जोन की उपकप्तानी करते हुए रन बनाने में तो असफल रहे पर गेंदबाजी करते हुए एक ही ओवर में दो-दो विकेट लेकर उन्होंने अपनी क्षमताएं दिखायी हैं। वैभव ने शानदार स्पिन गेंदबाजी करते हुए नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ एक ही ओवर में दो-दो विकेट ले लिये।
बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) में पूर्वी क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बीच चल रहे इस रोमांचक मुकाबले में वैभव का जादू 28वें ओवर में चला। इस ओवर की दूसरी गेंद पर वैभव ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के बल्लेबाज लिंगदोह को एक बड़ा शॉट खेलने के प्रयास में सर्कल के भीतर ही कैच आउट करवाया।
अभी विपक्षी टीम इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि वैभव ने इसी ओवर की पांचवीं गेंद पर, नए बल्लेबाज लेमतूर को विकेटकीपर ईशान किशन के हाथों कैच आउट करवाकर पवेलियन का रास्ता दिखा दिया। एक ही ओवर में दो महत्वपूर्ण विकेट हासिल करने के बाद वैभव सूर्यवंशी का उत्साह देखने लायक था। उनका यह प्रदर्शन न केवल विरोधी टीम पर दबाव बनाने वाला था, बल्कि उनकी टीम के लिए भी प्रेरणादायक साबित हुआ।
दलीप ट्रॉफी, जो भारत के घरेलू क्रिकेट में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, युवा प्रतिभाओं को अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने का एक शानदार मंच प्रदान करती है। वैभव ने पूर्वी क्षेत्र के उपकप्तान के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता का भी परिचय दिया।
टीम के कप्तान और अनुभवी विकेटकीपर ईशान किशन ने वैभव की गेंदों पर चुस्त विकेटकीपिंग का प्रदर्शन करते हुए लेमतूर का कैच लपका, जो टीम वर्क का एक बेहतरीन उदाहरण था। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक युवा खिलाड़ी, अनुभवी खिलाड़ियों के साथ मिलकर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
हालांकि, वैभव सूर्यवंशी का दिन बल्लेबाजी के लिहाज से उतना सफल नहीं रहा था। अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी और बड़े छक्कों के लिए मशहूर यह युवा खिलाड़ी, इस मुकाबले में सिर्फ छह गेंदों का सामना कर आठ रन ही बना सका और पवेलियन लौट गया।
उन्होंने अपने इन आठ रनों में दो शानदार चौके जरूर लगाए थे, लेकिन उनकी बल्लेबाजी पारी उम्मीदों के मुताबिक नहीं थी। यह एक अजीबोगरीब स्थिति थी जहां एक ओर उनका बल्ला शांत रहा, वहीं दूसरी ओर उनकी गेंद ने कहर बरपाया। यह विरोधाभास उनके प्रदर्शन को और भी यादगार बना देता है।