जेन स्ट्रीट की हेराफेरी ने भारत के डेरिवेटिव बाजार की खामियों को किया उजागर
Aug 04, 2025
नई दिल्ली,। देश के नियामकों ने एक हाई फ्रीक्वेंसी वाली ट्रेडिंग फर्म, जेन स्ट्रीट को बाजार में हेराफेरी करते पिछले दिनों पकड़ा था, लेकिन सच यह है कि इसने सालों की बढ़ोतरी के बाद भारत के डेरिवेटिव बाजार के मूल में मौजूद गहरी संरचनात्मक खामियों को उजागर कर दिया है। एक तो वायदा और विकल्प यानी एफऐंडओ कारोबार के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सूचकांक त्रुटिपूर्ण हैं। दूसरा नीति निर्माताओं का यह दावा पूरी तरह सही नहीं है कि डेरिवेटिव बाजार कुशल मूल्य निर्धारण को सक्षम बनाता है, बाजार में नकदी की स्थिति में सुधार करता है और निवेशकों को जोखिम प्रबंधन की अनुमति देता है। इंडेक्स डेरिवेटिव्स में विशाल मात्रा केवल दो सूचकांकों तक सीमित है। निफ्टी 50 और बैंक निफ्टी और कुछ हद तक फिननिफ्टी।
सूचकांक निर्माण को अक्सर एक अजीबो-गरीब अभ्यास माना जाता है। इसमें भार, नकदी, मुक्त प्रवाह, क्षेत्रवार प्रतिनिधित्व जैसे कार्यप्रणाली संबंधी मुद्दों पर बहस होती है और फिर सूचकांकों में शेयरों को जोड़ने और हटाने के लिए समय-समय पर इन सबकी समीक्षा होती है। ऐसे तकनीकी निर्णय ट्रेडिंग और सट्टेबाजी के लिए गौण लग सकते हैं, लेकिन इनके गहरे निहितार्थ होते हैं। इंडेक्स एफऐंडओ बाजार पर करीब काबिज दो सूचकांकों में से, बैंक निफ्टी और भी ज्यादा विषम है। इसके दो घटक यानी एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक इसके भार का आश्चर्यजनक रूप से 53 फीसदी हिस्सा रखते हैं।
सूचकांक के शीर्ष पांच शेयरों का कुल भार 82 फीसदी है। यदि यह सूचकांक एक ऐसा उत्पाद होता जो केवल बैंकिंग शेयरों की दिशा का संकेत देता, तो यह हानिरहित होता। लेकिन यदि कोई म्युचुअल फंड बैंकिंग क्षेत्र का फंड प्रस्तुत करना चाहता है, तो वह बैंक निफ्टी को मानक सूचकांक के रूप में इस्तेमाल करेगा। समस्या यहीं से शुरु होती है। सेबी चाहता है कि निवेश प्रबंधक मानक सूचकांक को गंभीरता से लें, लेकिन एक ऐसा सूचकांक कितना सार्थक हो सकता है जहां 53 फीसदी भार दो शेयरों में है? यदि एक बैंकिंग क्षेत्र के फंड ने 25-30 शेयरों में निवेश किया है, जिसमें से 10 फीसदी एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक को आवंटित हैं, तो ऐसे फंड के लिए मानक सूचकांक कितना सार्थक होगा?