विकसित यूरोपीय राष्ट्रों में निर्वाचित नेताओं के प्रति बढ़ी नाराजी
Jul 11, 2024
- आर्थिक असमानता से बढ़ रही है नाराजी
न्यूयॉर्क। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति धनी राष्ट्रों में निर्वाचित नेताओं के प्रति आम लोगों की नाराजी बढ़ रही है। राजनेताओं पर नागरिकों को अब भरोसा नहीं रहा। यह बात प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में सामने आई है। सर्वे में अमेरिका के 80 फ़ीसदी नागरिकों ने कहा है, निर्वाचित नेता नागरिकों की परवाह नहीं करते हैं। चुनाव प्रणाली दोषपूर्ण है। उसमें सुधार करने की जरूरत है। यूरोपीय देशों के लोगों में नेताओं के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। युवा और शिक्षित वर्ग वर्तमान राजनीति से नाराज है। इसकी सबसे बड़ी वजह आर्थिक असमानता है। सरकारों द्वारा आर्थिक असमानता को कम करने के स्थान पर पूंजीपतियों के हित मे नीतियां बनाने से आर्थिक और सामाजिक असमानता बढ़ी है। न्याय व्यवस्था को लेकर भी नागरिकों में नाराजी बढ़ रही है। जिन देशों की उच्च आय बेहतर है। वहां पर महिलाओं और बुजुर्गों के अधिकारों को लेकर लगातार उपेक्षा हो रही है। नेताओं के प्रति नागरिकों की नाराजी बढ़ती जा रही है। जो लोकतंत्र के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
दुनिया के देशों में लोकतंत्र के प्रति आस्था कम हो रही है। 2021 में आर्थिक रूप से श्रमद्ध 12 राष्ट्रों मे लोकतंत्र के प्रति संतुष्टि के जवाब में 49 फीसदी औसत था। जो 2024 में घटकर 36 फीसदी रह गया है। दुनिया भर में लोकतंत्र के प्रति आस्था को लेकर सबसे ज्यादा असंतोष ब्रिटेन में पाया गया है। 2021 में 60 फ़ीसदी लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था से संतुष्ट थे, 2024 में यह घटकर 21 फ़ीसदी पर आ गया है। दक्षिण कोरिया में 36 फीसदी लोग लोकतंत्र से खुश हैं। 2021 में यह आंकड़ा 53 फ़ीसदी था। अमेरिका और जापान में लोकतंत्र पर लोग अब कम भरोसा कर रहे हैं।दोनों देशों में 31 फ़ीसदी लोग ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर अपना विश्वास जता रहे हैं। कनाडा में भी 14 फ़ीसदी लोगों की लोकतंत्र के प्रति आस्था पिछले तीन वर्षों में कम हुई है.
विकासशील और गरीब देशों, जिसमें सिंगापुर में 80 फ़ीसदी, भारत में 77 फ़ीसदी, थाईलैंड में 64 फ़ीसदी, ऑस्ट्रेलिया में 60 फीसदी, फिलिपींस में 57 फ़ीसदी नागरिक लोकतंत्र के प्रति अभी भी आस्था जता रहे हैं। दुनिया के देशों में जिस तरह से आर्थिक असमानता बढ़ रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस तरह से पूंजीवाद का प्रभाव बढ़ रहा है। सरकारी नीतियां पूंजीवादियों के हित में तैयार की जा रही हैं। उसके कारण वर्तमान की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से लोगों का मोह भंग होने लगा है।