सृजनविविधा में गीत रचना की बारिकियों पर चर्चा के साथ हुआ रचनापाठ
Aug 20, 2024
इन्दौर छंदबद्ध भावपूर्ण रचना ही गीत है। अंतरे के तुकांत पर ध्यान देना चाहिए। गीत में गेयता और लयबद्धता होनी चाहिए। गीत रचना की यह गूढ़ बातें गीत को परिभाषित करते हुए प्रसिद्ध दोहाकार, गीतकार और समीक्षक प्रभु त्रिवेदी ने गीतविधा के छंदानुशासन और रचना प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा करते हुए कही। मौका था संस्था श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति में सृजनविविधा के कार्यक्रम के प्रथम सत्र का। इसके साथ ही प्रभु त्रिवेदी ने कहा कि प्रयुक्त छंद में मात्राओं की गणना करना भी रचनाकार आना जरूरी है। हिंदी उर्दू शब्द योजना में जो अंतर है, उसे समझ कर गीत रचना करना चाहिए और शुद्ध उच्चारण का भी ध्यान रखना चाहिए। सृजनविविधा के दूसरे सत्र में रचनापाठ हुआ।
जिसमें यश बंसोडे ने उनकी दी हुई आजादी हमको ही बचाना है, इस हंसती बगिया को हमको फिर से सजाना है, मनीष दवे ने तिरंगा फहराएंगे विश्व पटल पर हर हाल में कभी ना रखेंगे नाचेंगे हम पैर पसारे ही रहेंगे,शीला चंदन जख्मों से घायल ना रेत है ना पानी। तड़पकर कहते हैं तेरी हुई जवानी लौट कर आएंगे फिर यहीं तेरे दामन में लिखते हुए चलेंगे लहू की कहानी, संतोष त्रिपाठी ने शपथ कविता हम एक वने हम नेक बनें हम जाति धर्म से दूर रहे कर्तव्य मार्ग से भी विमुख ना हों, जब तक इस तन में जान रहे के अलावा हटेसिंह, अमन पांडे, नम्रता खेर, वसुधा गाडगिल, दिलीप नीमा ने भी अपनी रचनाएं सुनाई। संचालन डा. अर्पण जैन ने किया। आभार डा. पद्मासिंह ने माना।