भाजपा सरकार आदिवासी एवं अन्य वनवासी वर्ग के अधिकारों का हनन कर रही है - तिवारी

Aug 08, 2023


-आर्थिक संकट से जूझ रहा है तेंदूपत्ता संग्रहक

-कूनो उद्यान में 9 चीतों की मौत से राष्ट्र की छवि हुई है धूमिल

भोपाल ।  मप्र कांग्रेस वन एवं पर्यावरण प्रकोष्ठ के प्रदेष अध्यक्ष डॉ. एस.पी. एस. तिवारी ने  पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए कहा कि  मध्यप्रदेश में प्रदेश के कुल भैगोलिक क्षेत्रफल का 30ः वन क्षेत्र है। प्रदेश में 21ः जनसंख्या आदिवासी समुदाय की है एवं 9ः जनसंख्या अन्य वनवासी भाई-बहनों की है। इस तरह 30ः जनसंख्या आदिवासी एवं अन्य वनवासी भाई-बहनों की है, जिनकी आजीविका कहीं न कहीं वन एवं वनोपज पर निर्भर है। वर्तमान भा.ज.पा. सरकार आदिवासी/वनवासी भाई-बहनों के हित में कोई काम न करते हुए इनके अधिकारों का हनन कर रही है।

2. मध्यप्रदेश में लगभग 20 लाख तेन्दुपत्ता संग्राहक हैं एवं प्रतिवर्ष लगभग औसतन 20 लाख मानक बोरा तेन्दुपत्ता संग्रहण होता है एवं औसतन लगभग 1,200 करोड़ रूपये का तेन्दुपत्ता का व्यापार मध्यप्रदेश शासन, वन विभाग, करता है। तेन्दुपत्ता संग्राहकों की संग्रहण मजदूरी दर 3,000/- प्रति मानक बोरा है, जबकि छत्तीसगढ़ में 4,000/- प्रतिमाह बोरा है। कांग्रेस पार्टी मजदूरी दर बढ़ाने हेतु वर्तमान सरकार को लेख कर चुकी है परन्तु वर्तमान सरकार के द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया गया है। पिछले वर्ष तेन्दुपत्ता का संग्रहण लगभग 18 लाख मानक बोरा हुआ था, परन्तु इस साल खराब मौसम के कारण मात्र 12 लाख मानक बोरा का ही तेन्दुपत्ता संग्रहण हो पाया है। इस तरह लगभग 180 करोड़ रूपये तेन्दुपत्ता संग्राहकों को कम मजदूरी मिली है। एवं वो आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। परन्तु वर्तमान सरकार 240 करोड़ रूपये संग्राहकों के खाते में न जमा कर इस राशि से जूते, चप्पल, साड़ी तथा पानी की बोतल आयोजन करके बांट रही है। करोड़ों रूपये आयोजन करने में व्यय हो जायेगा। इस तरह संग्राहकों का पैसा उन्हीं से काटकर सरकार अपनी ब्रांडिंग के लिए अपव्यय कर रही है।

3. मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में कूनो राष्ट्रीय उद्यान शेरों के लिए 100 करोड़ रूपये खर्च करके तैयार किया गया था। गिरी से शेर यहां लाकर बसाए जाने थे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी वर्ष 2013 में कूनो में गिरी से शेर लाकर बसाने के निर्देश दिए थे। परन्तु गुजरात की भा.ज.पा. सरकार ने राज हठ के चलते शेर कूनो के लिए नहीं दिए। आनन-फानन में पिछले वर्ष 17 सितम्बर 2022 को माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के जन्मदिन के अवसर पर नामीबिया एवं दक्षिण अफ्रीका से 20 चीता जो कैप्टिव ब्रीडिंग के थे लाकर कूनो में छोड़े गए। चूंकि भारत में पिछले 07 दशक से चीते नहीं हैं एवं विशेषज्ञ भी नहीं है साथ ही कूनो का आवोहवा भी चीता के लिए अनुकूल नहीं है फलस्वरूप 9 चीते मर चुके हैं एवं एक चीता नीरवा 10 दिन से गायब है।

राजस्थान में मुकुन्द्रा में चीतों के लिए जंगल तैयार किया गया है परन्तु चूंकि वहां कांग्रेस शासन है, इसलिए केन्द्र सरकार जानबूझकर हठ में चीते वहां न भेजकर कूनो में भेजे। इस तरह कूनो चीतो का कब्रगाह बन चुका है एवं अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को गहरा आघात लगा है।

4. मध्यप्रदेश में 827 वन ग्राम हैं। पिछले वर्ष 22 अप्रैल 2022 को आदरणीय अमित शाह, केन्द्रीय गृह मंत्री भारत सरकार, भोपाल में आकर घोषणा की थी कि वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तित किया जायेगा परन्तु आज तक वन ग्राम नहीं बना पाए। फलस्वरूप इन गांव के लोग शासन से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित हैं।

5. ऐतिहासिक वन अधिकार अधिनियम 2006 में केन्द्र में कांग्रेस शासनकाल में लाया गया। इस अधिनियम में आदिवासी समुदाय जो वन भूमि में दिसम्बर 2005 से पहले काबिज थे, उन्हें अधिकार पत्र देने का निर्णय हुआ। मध्यप्रदेश में लगभग 627513 दावे पेश किए गए परन्तु भा.ज.पा. के लगभग 18 वर्ष के शासनकाल में 51ः दावे निरस्त कर दिए गए। लगभग 3 लाख आदिवासी परिवार को 365000 हेक्टेयर ज़मीन वन अधिकार पत्र के रूप में दिए गए। यह ज़मीन उबड़-खाबड़ एवं असिंचित है। राजस्व किसानों की तरह इन आदिवासियों को किसान क्रेडिट कार्ड जैसी कोई सुविधा नहीं प्रदाय की जा सकी। फलस्वरूप इन्हें बैंक से कर्ज इत्यादि नहीं मिल रहा है एवं अधिकार पत्र में इनकी ज़मीन में उपज बहुत कम हो रही है।

6. मध्यप्रदेश में कांग्रेस शासन काल में वनों का प्रबंधन संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से किया जा रहा था। लगभग 15,600 गांवों में वन समितियां गठित की जाकर जनभागीदारी से वनों का प्रबंधन एवं सुरक्षा की जा रही थी। इन समितियों को वन सुरक्षा राशि एवं विकास राशि देने का प्रावधान था। समस्त वानिकी कार्य समिति सदस्यों के माध्यम से किया जा रहा था लेकिन 2014 से समितियों को सुरक्षा राशि एवं विकास राशि देना लगभग बंद कर दिया गया है एवं वानिकी कार्य भी मशीनों के माध्यम से सम्पन्न हो रहे हैं। फलस्वरूप समिति सदस्य बेरोज़गार हो गए हैं और समितियां निष्क्रिय हो गई हैं। बुरहानपुर एवं लटेरी की घटना समितियों की निष्क्रियता का ही परिणाम है।

7. आदिवासियो की निजी भूमियों पर खड़े वृक्षों को काटने की अनुमति अभी भी कलेक्टर द्वारा दिया जाता है। फलस्वरूप आदिवासी अपने खेत की बीच अपने उपयोग के लिए नहीं वृक्षों को नहीं काट पाते हैं।

8. ओला/पाला एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले वनोपज के नुकसान का कृषि फसल की तरह हितग्राहियों को आर.बी.सी. की तरह मुआवजा दिलाने का प्रावधान शासन द्वारा नहीं किया गया है। इस संबंध में माननीय पूर्व मुख्यमंत्री एवं प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस कमेटी श्री कमलनाथ जी ने मुख्यमंत्री का पत्र के माध्यम से ध्यान भी आकृष्ट किया है, परन्तु आज तक कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

9. यदि कोई वन कर्मी शासकीय कार्य करते हुए किसी वन माफिया अथवा शिकारियों द्वारा मारा जाता है तो उसे शहीद का दर्जा पुलिस की भांति देने का प्रावधान भी वर्तमान सरकार नहीं कर सकी है।

10. आदिवासी भाई-बहनों के विरूद्ध मध्यप्रदेश में लगातार अपराध बढ़ रहे हैं परन्तु वर्तमान सरकार गूंगी बनी बैठी है।

11. वर्तमान भा.ज.पा. सरकार में प्रत्येक व्यक्ति पर 50,000/- का कर्जा हो चुका है परन्तु प्रतिव्यक्ति वृक्ष सिर्फ 27 ही बचे हैं। इस शासनकाल मंे वन एवं पर्यावरण का गंभीर ह्रास हुआ है।

12. लघु वनोपज का उचित मूल्य वर्तमान सरकार देने में असफल रही है। साथ ही लघु वनोपज का प्रसंस्करण भी नहीं हो पा रहा है। फलस्वरूप आदिवासी/वनवासी भाई-बहनों को रोज़गार में बहुत कमी आई है।

13. भोपाल से सटे रातापानी अभ्यारण्य में 70 से अधिक बाघ पाये गये हैं। रातापानी अभ्यारण्य प्रोजेक्ट टाईगर के लिए अनुकूल है, परंतु भाजपा शासन में कई बार स्टेट बाइल्ड लाईफ बोर्ड में इस पर विचार हुआ, परंतु माननीय मुख्यमंत्री जी षिवराजसिंह चौहान जो कि बोर्ड के अध्यक्ष है, इसे सिरे से नकार दिया। इस तरह स्थानीय लोगों को टाईगर टूरिज्म से मिलने वाला रोजगार नहीं मिल पा रहा है।




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