साल 2025 मेडिसिन का नोबेल 2 अमेरिकी और 1 जापानी वैज्ञानिक को:इम्यून सिस्टम को बेहतर समझने के लिए मिला

साल 2025 का मेडिसिन का नोबेल प्राइज 3 वैज्ञानिकों को मिला है। इनमें से मरी ई. ब्रंकॉ और फ्रेड राम्सडेल अमेरिका जबकि शिमोन साकागुची जापान के हैं।

इन्हें यह पुरस्कार शरीर की रक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को बेहतर समझने की खोज के लिए मिला है।इन्हें यह पुरस्कार शरीर की रक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को बेहतर समझने की खोज के लिए मिला है।

मेडिसिन का नोबेल 2 अमेरिकी और 1 जापानी वैज्ञानिक को: इम्यून सिस्टम को बेहतर समझने के लिए मिला भौतिकी, साहित्य और शांति सहित कई क्षेत्रों में दिए जाने वाले नोबेल पुरस्कारों की घोषणा सोमवार, 6 अक्टूबर से शुरू हुई और 13 अक्टूबर तक जारी रहेगी।

सबसे पहले मेडिसिन के पुरस्कार की घोषणा होगी। यह पुरस्कार उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है जिन्होंने चिकित्सा या मानव स्वास्थ्य में बड़ी खोज की हो।

अवॉर्ड का ऐलान स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट से दोपहर करीब 3:00 बजे होगा। विजेता को 11 मिलियन स्वीडिश क्रोना (लगभग 9 करोड़ रुपए), सोने का मेडल और सर्टिफिकेट मिलेगा। पुरस्कार 10 दिसंबर को स्टॉकहोम में दिए जाएंगे।


    • मरी ई. ब्रंकॉ: अमेरिकी वैज्ञानिक, जीन के काम पर रिसर्च।
    • फ्रेड राम्सडेल: ब्रिटिश वैज्ञानिक, इम्यून सिस्टम विशेषज्ञ।
    • शिमोन साकागुची: जापानी वैज्ञानिक, टी सेल्स की खोज के लिए मशहूर।
    • इम्यून सिस्टम को बेहतर समझने की खोज के लिए मिला नोबेल

      साल 2025 का मेडिसिन का नोबेल प्राइज 3 वैज्ञानिकों को मिला है। इनमें से मरी ई. ब्रंकॉ और फ्रेड राम्सडेल अमेरिका जबकि शिमोन साकागुची जापान के हैं। इन्हें यह पुरस्कार शरीर की रक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को बेहतर समझने की खोज के लिए मिला है।इन्हें यह पुरस्कार शरीर की रक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को बेहतर समझने की खोज के लिए मिला है।

      मेडिसिन का नोबेल 2 अमेरिकी और 1 जापानी वैज्ञानिक को: इम्यून सिस्टम को बेहतर समझने के लिए मिला


      कैसे होगा ऐलान?

      • स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट की नोबेल कमेटी विजेताओं को चुनेगी। कमेटी के 5 सदस्य हजारों नामांकनों की जांच करेंगे।
      • कमेटी के सेक्रेटरी थॉमस पर्लमैन विजेताओं को फोन करेंगे और फिर ऐलान होगा।
      • इसे nobelprize.org की वेबसाइट, यूट्यूब या सोशल मीडिया पर लाइव देखा जा सकेगा।
      • कैंसर के इलाज में मददगार

        इन्हें यह पुरस्कार पेरीफेरल इम्यून टॉलरेंस पर रिसर्च के लिए मिला है।

        पेरीफेरल इम्यून टॉलरेंस को अगर आसान भाषा में समझें तो यह हमारे शरीर की इम्यून सिस्टम के उस व्यवहार को कहते हैं जिसमें वह स्वयं के उत्तकों (टिशू) पर हमला नहीं करता है।

        इस काम से कैंसर के इलाज और अंग ट्रांसप्लांट को बेहतर बनाने में भी मदद मिलेगी। नोबेल कमेटी ने कहा- इनकी खोज ने चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा दी।

        हमारे शरीर में इम्यून सिस्टम काम वायरस, बैक्टीरिया और बाकी हानिकारक पदार्थों से लड़ना है, लेकिन कभी-कभी यह सिस्टम गलत तरीके से शरीर के अपने हिस्सों को भी खतरा समझने लगता है, जिससे ऑटोइम्यून रोग (जैसे टाइप 1 डायबिटीज, रूमेटॉयड अर्थराइटिस) हो सकते हैं।ऐसे में पेरीफेरल इम्यून टॉलरेंस सेल्फ एंटिजन की पहचान कर हानिकारक प्रतिक्रिया को रोकता है।

        यह सिस्टम जानता है कि कौन से सेल या प्रोटीन हमारे शरीर के हैं। ऐसे में कोई टी-सेल शरीर के अपने सेल्स पर हमला करने की कोशिश करती है तो पेरीफेरल इम्यून टॉलरेंस उसे निष्क्रिय या फिर समाप्त कर देती है।

        1895 में हुई थी नोबेल पुरस्कार की स्थापना

      नोबेल पुरस्कारों की स्थापना 1895 में हुई थी और पुरस्कार 1901 में मिला। 1901 से 2024 तक मेडिसिन की फील्ड में 229 लोगों को इससे सम्मानित किया जा चुका है। इन पुरस्कारों को वैज्ञानिक और इन्वेंटर अल्फ्रेड बर्नहार्ड नोबेल की वसीयत के आधार पर दिया जाता है। शुरुआत में केवल फिजिक्स, मेडिसिन, केमिस्ट्री, साहित्य और शांति

    • GLP-1 नोबेल की सबसे बड़ी दावेदार

      एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे समय में, जब दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग मोटापे से जूझ रहे हैं, ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड-1 (GLP-1) नामक हार्मोन पर हुई रिसर्च को विशेष सम्मान मिलने की संभावना है।

      इसने हार्मोन और उससे जुड़े रिसर्च ने वैश्विक स्तर पर मोटापे और मधुमेह से निपटने में बदलाव लाने वाली दवाओं (ओजेम्पिक, वेगोवी और मौनजारो) के बनने का रास्ता आसान किया है। इस खोज का सामाजिक और चिकित्सीय महत्व इतना बड़ा है कि इसे नोबेल पुरस्कार की दौड़ में सबसे आगे रखा जा रहा है।


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