मेरा कम्यून बिलकुल अलग तरह की घटना है। ना तो यह आधुनिक आश्रम है या पौराणिक, न ही कोई ईसाई या मोहम्मडन मोनेस्ट्री। मेरा कम्यून सबसे पहले तो गैर-तपस्सवी है। यह बुनियादी रूप से तुम्हारी सारी मानसिक बीमारियों को नष्ट करने की चेष्टा है? जिसमे सेडोमैसो िचस्टविचार सम्मलित हैं। यह तुम्हे स्वस्थ होने की शिक्षा दे रहा है ना कि अपने स्वास्थ के प्रति आत्म-ग्लानी से भरने की। यह तुम्हे मनुष्य बनना सिखा रहा है, क्योंकि मेरा अनुभव है कि जिन लोगों ने भी दिव्य होने की चेष्टा की है, वे दिव्य तो हुए नहीं वरन मनुष्यता से भी निक्रष्टतम कोटि में गिर गए। वे मनुष्यता के पार जाने की चेष्टा में लगे हुए थे– हां, वे मनुष्यता से पार तो चले गए हैं, पर नीचे की ओर। मोनेस्ट्रियों में, लोग लगभग पाशविक हो गए हैं, क्योंकि जितने ज्यादा तुम खुद को सताते हो, उतना ही ज्यादा तुम अपनी प्रज्ञा खोने लगते हो; प्रज्ञा को सुविधा की आवश्यकता होती है। तुम रेगिस्तान में गुलाब खिलाने की चेष्टा न करो…प्रज्ञा एक अत्यंत सुकोमल फूल है। वह विलासिता में उगता है। उसे एक विलासपूर्ण भूमी की आवश्यकता होती है, सृजनात्मक, रस से भरी; तभी वह खिल सकती है। और बिना प्रज्ञा के, तुम क्या हो? मेरा पूरा प्रयास पहले तो तुम्हारी प्रज्ञा को एक लपट बना देने का है, एक ऐसी लपट जो उस सब को नष्ट कर दे जो भी तुम में तुम्हारा स्वयं का नहीं है। तुम एक आग बन जाओ और उस सब को जला दो जो दूसरों द्वारा तुम पर फेंका गया है। तो पहले तो प्रज्ञा, और दूसरा ध्यान। ध्यान प्रज्ञा से आता है–अपने भीतर का सारा कचरा जला देने से। तब तुम पवित्र हुए, अकेले, जैसा कि तुम्हे आस्तित्व बनाना चाहता है।